अध्याय 2 : मेंडेलियन आनुवंशिकी (Mendelian Genetics)
2.1 परिचय (Introduction)
आनुवंशिकी के क्षेत्र में प्रथम सफल प्रयोग तथा वंशागति के नियमों का प्रतिपादन ग्रेगर जॉन मेंडेल ने किया।
मेंडेल ऑस्ट्रिया (Austria) के एक गिरजाघर के पादरी थे।
उन्होंने मटर के पौधे (Pisum sativum) पर अनेक नियंत्रित संकरण प्रयोग किए।
प्राप्त परिणामों का गणितीय विश्लेषण करके वंशागति के कुछ मूल नियम स्थापित किए।
इन नियमों को मेंडेलवाद (Mendelism) या मेंडेल के वंशागति के नियम (Mendel’s laws of inheritance) कहा जाता है।
प्रमुख परिभाषाएँ
वंशागति (Inheritance) – माता‑पिता से संतान में लक्षणों का स्थानांतरण।
वंशागत लक्षण (Hereditary characters) – वे गुण जो जनकों (Parents) से संतति (Offspring) में स्थानांतरित होते हैं।
2.2 ग्रेगर जॉन मेंडेल का संक्षिप्त जीवनवृत्त (Brief Life Sketch of Gregor Johann Mendel)
जन्म : 22 जुलाई 1822
जन्म स्थान : हाइनज़ेंडोर्फ (Heinzendorf), सिलेसिया प्रांत, ऑस्ट्रिया
परिवार : एक माली के परिवार में जन्म
बचपन से ही सजीव वस्तुओं एवं प्रकृति में गहरी रुचि
शिक्षा एवं जीवन
प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव के विद्यालय में प्राप्त की।
1842 में दर्शनशास्त्र (Philosophy) में डिग्री प्राप्त की।
अक्टूबर 1843 में ब्रून (Brunn) के चर्च में पादरी बने।
यहीं पर उन्हें बगीचे की सुविधा मिली जहाँ प्रयोग किए।
1849 में एक वर्ष तक अध्यापन कार्य किया।
बाद में प्राकृतिक विज्ञान एवं गणित के अध्ययन हेतु वियना विश्वविद्यालय गए।
कुछ समय बाद पुनः ब्रून लौटकर विज्ञान के अध्यापक बने।
वैज्ञानिक योगदान
तर्क और गणितीय विश्लेषण में अद्भुत प्रतिभा।
अध्यापन काल में गिरजाघर के उद्यान में मटर के पौधों पर संकरण प्रयोग किए।
इन्हीं प्रयोगों से वंशागति के प्रसिद्ध नियम स्थापित हुए।
परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु (Quick Revision Points)
मेंडेल को “आनुवंशिकी का जनक” कहा जाता है।
प्रयोग की मुख्य वस्तु – मटर का पौधा (Pisum sativum)
मेंडेल के नियम – वंशागति के मूल नियम
वंशागत लक्षण – जनकों से संतति में आने वाले गुण
मेंडेल के प्रयोगों का विवरण (अतिरिक्त जानकारी)
मेंडेल ने मटर (Pisum sativum) के पौधों पर 1857 से 1865 तक संकरण (Hybridization) प्रयोग किए।
1865 में अपने प्रयोगों के निष्कर्ष "ब्रून सोसाइटी ऑफ नेचुरल हिस्ट्री" के समक्ष शोधपत्र के रूप में प्रस्तुत किए।
1866 में यह कार्य "पादप संकरण के प्रयोग" नामक शोधपत्र में प्रकाशित हुआ।
इन्हीं परिणामों के आधार पर वंशागति के नियमों का प्रतिपादन किया गया।
उस समय वैज्ञानिक इस कार्य का महत्व नहीं समझ पाए, इसलिए मेंडेल के नियम लंबे समय तक उपेक्षित रहे।
6 जनवरी 1884 को मेंडेल की मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय वे दीर्घकालीन वृक्कशोथ (Chronic nephritis) से पीड़ित थे।
2.3 मेंडेलवाद की पुनर्खोज (Rediscovery of Mendelism)
मेंडेल के नियम लगभग 35 वर्षों तक उपेक्षित रहे।
सन् 1900 में स्वतंत्र रूप से तीन वैज्ञानिकों ने मेंडेल के नियमों की पुनः खोज की –
ह्यूगो डी व्रीस (Hugo de Vries) – हॉलैंड
कार्ल कोरेंस (Karl Correns) – जर्मनी
एरिक वॉन शेरमाक (Erick Von Tschermak) – ऑस्ट्रिया
इन तीनों वैज्ञानिकों को मेंडेलवाद के पुनर्खोजकर्ता माना जाता है।
2.4 मेंडेल के प्रयोग (Mendel’s Experiments)
प्रयोग की मुख्य विशेषताएँ
प्रयोग की वस्तु – मटर का पौधा (Pisum sativum)
प्रयोग के प्रकार –
एकसंकर संकरण (Monohybrid hybridization)
द्विसंकर संकरण (Dihybrid hybridization)
लक्षणों का चयन
मेंडेल ने मटर में 34 विपरीत लक्षणों (Contrasting characters) का अध्ययन किया।
विस्तृत प्रयोग केवल 7 प्रमुख लक्षणों पर किए।
प्रत्येक लक्षण के दो स्पष्ट विपरीत रूप थे (जैसे – लंबा/बौना, गोल/झुर्रीदार बीज आदि)।
परीक्षा हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य
प्रयोग काल – 1857 से 1865
शोधपत्र प्रस्तुति – 1865
प्रकाशन वर्ष – 1866
मृत्यु – 6 जनवरी 1884
मेंडेलवाद की पुनर्खोज – सन् 1900
पुनर्खोजकर्ता – Hugo de Vries, Karl Correns, Erick Von Tschermak
2.4.1 प्रयोग के लिये मटर पौधे की उपयुक्तता (Suitability of Pea Plant)
मटर एकवर्षीय पौधा है – एक वर्ष में कई पीढ़ियों का अध्ययन संभव।
फूल उभयलिंगी होते हैं – परपरागण व विपुंसन (Emasculation) आसानी से किया जा सकता है।
प्राकृतिक रूप से स्वपरागित – शुद्ध वंश (Pure line) प्राप्त करना सरल।
अनेक स्पष्ट विपरीत लक्षण उपलब्ध।
2.4.2 मेंडेल की अध्ययन विधि एवं सफलता के कारण
शुद्ध नस्ल (Pure breeding) पौधों का चयन।
एक समय में केवल एक लक्षण का अध्ययन।
सही सांख्यिकीय अभिलेख एवं गणितीय विश्लेषण।
F₃ पीढ़ी तक अध्ययन।
2.4.3 मटर के सात जोड़ी विपरीत लक्षण (Selection of Traits)
पौधे की लंबाई – लंबा / बौना
फूलों की स्थिति – कक्षीय (Axillary) / अग्रस्थ (Terminal)
फली का रूप – चपटा / संकीर्ण
कच्ची फली का रंग – हरा / पीला
बीज की आकृति – गोल / झुर्रीदार
बीजचोल का रंग – धूसर / श्वेत
बीजपत्र का रंग – पीला / हरा
2.5 मेंडेल द्वारा किये गये प्रयोग
जनक पीढ़ी (P), प्रथम संतानीय पीढ़ी (F₁), द्वितीय संतानीय पीढ़ी (F₂)
मुख्य प्रयोग –
एकसंकर संकरण (Monohybrid cross)
द्विसंकर संकरण (Dihybrid cross)
2.5.1 एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross)
एक जोड़ी विपरीत लक्षणों के बीच संकरण।
उदाहरण – लंबा (TT) × बौना (tt)
परिणाम
F₁ पीढ़ी – सभी पौधे लंबे (Tt) – प्रभावी लक्षण प्रकट।
F₂ पीढ़ी –
लक्षण अनुपात (Phenotype) = 3 लंबा : 1 बौना
जीन अनुपात (Genotype) = 1 TT : 2 Tt : 1 tt
2.5.2 द्विसंकर संकरण (Dihybrid Cross)
दो जोड़ी विपरीत लक्षणों का एक साथ अध्ययन।
उदाहरण – गोल-पीला (RRYY) × झुर्रीदार-हरा (rryy)
परिणाम
F₁ – सभी गोल-पीले (RrYy)
F₂ लक्षण अनुपात = 9 : 3 : 3 : 1
9 गोल पीले
3 गोल हरे
3 झुर्रीदार पीले
1 झुर्रीदार हरे
2.6 मेंडेल के आनुवंशिकता के नियम (Mendel’s Laws of Inheritance)
(1) प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
विषमयुग्मजी अवस्था में केवल प्रभावी लक्षण प्रकट होता है।
(2) पृथक्करण का नियम / युग्मकों की शुद्धता (Law of Segregation)
युग्मक निर्माण के समय जीन युग्म अलग-अलग हो जाते हैं।
प्रत्येक युग्मक में एक ही कारक जाता है।
(3) स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)
भिन्न लक्षणों के जीन स्वतंत्र रूप से वंशागति करते हैं।
द्विसंकर संकरण पर लागू।
2.7 मेंडेल के नियमों का महत्व (Importance of Mendel’s Laws)
संकरण संतानों का पूर्वानुमान संभव।
उपयोगी लक्षणों का विकास व हानिकारक लक्षणों का निष्कासन।
उन्नत किस्मों का विकास – फसल व पशुपालन में उपयोग।
मानव आनुवंशिकी एवं सुजनिकी (Eugenics) का आधार।
अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision)
एकसंकर अनुपात – 3 : 1
जीन अनुपात – 1 : 2 : 1
द्विसंकर अनुपात – 9 : 3 : 3 : 1
F₁ में केवल प्रभावी लक्षण दिखाई देता है।
स्वतंत्र अपव्यूहन नियम द्विसंकर संकरण पर आधारित है।