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शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

 

अध्याय 2 : मेंडेलियन आनुवंशिकी (Mendelian Genetics)

2.1 परिचय (Introduction)

  • आनुवंशिकी के क्षेत्र में प्रथम सफल प्रयोग तथा वंशागति के नियमों का प्रतिपादन ग्रेगर जॉन मेंडेल ने किया।

  • मेंडेल ऑस्ट्रिया (Austria) के एक गिरजाघर के पादरी थे।

  • उन्होंने मटर के पौधे (Pisum sativum) पर अनेक नियंत्रित संकरण प्रयोग किए।

  • प्राप्त परिणामों का गणितीय विश्लेषण करके वंशागति के कुछ मूल नियम स्थापित किए।

  • इन नियमों को मेंडेलवाद (Mendelism) या मेंडेल के वंशागति के नियम (Mendel’s laws of inheritance) कहा जाता है।

प्रमुख परिभाषाएँ

  • वंशागति (Inheritance) – माता‑पिता से संतान में लक्षणों का स्थानांतरण।

  • वंशागत लक्षण (Hereditary characters) – वे गुण जो जनकों (Parents) से संतति (Offspring) में स्थानांतरित होते हैं।


2.2 ग्रेगर जॉन मेंडेल का संक्षिप्त जीवनवृत्त (Brief Life Sketch of Gregor Johann Mendel)

  • जन्म : 22 जुलाई 1822

  • जन्म स्थान : हाइनज़ेंडोर्फ (Heinzendorf), सिलेसिया प्रांत, ऑस्ट्रिया

  • परिवार : एक माली के परिवार में जन्म

  • बचपन से ही सजीव वस्तुओं एवं प्रकृति में गहरी रुचि

शिक्षा एवं जीवन

  • प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव के विद्यालय में प्राप्त की।

  • 1842 में दर्शनशास्त्र (Philosophy) में डिग्री प्राप्त की।

  • अक्टूबर 1843 में ब्रून (Brunn) के चर्च में पादरी बने।

  • यहीं पर उन्हें बगीचे की सुविधा मिली जहाँ प्रयोग किए।

  • 1849 में एक वर्ष तक अध्यापन कार्य किया।

  • बाद में प्राकृतिक विज्ञान एवं गणित के अध्ययन हेतु वियना विश्वविद्यालय गए।

  • कुछ समय बाद पुनः ब्रून लौटकर विज्ञान के अध्यापक बने।

वैज्ञानिक योगदान

  • तर्क और गणितीय विश्लेषण में अद्भुत प्रतिभा।

  • अध्यापन काल में गिरजाघर के उद्यान में मटर के पौधों पर संकरण प्रयोग किए।

  • इन्हीं प्रयोगों से वंशागति के प्रसिद्ध नियम स्थापित हुए।


परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु (Quick Revision Points)

  • मेंडेल को “आनुवंशिकी का जनक” कहा जाता है।

  • प्रयोग की मुख्य वस्तु – मटर का पौधा (Pisum sativum)

  • मेंडेल के नियम – वंशागति के मूल नियम

  • वंशागत लक्षण – जनकों से संतति में आने वाले गुण

मेंडेल के प्रयोगों का विवरण (अतिरिक्त जानकारी)

  • मेंडेल ने मटर (Pisum sativum) के पौधों पर 1857 से 1865 तक संकरण (Hybridization) प्रयोग किए।

  • 1865 में अपने प्रयोगों के निष्कर्ष "ब्रून सोसाइटी ऑफ नेचुरल हिस्ट्री" के समक्ष शोधपत्र के रूप में प्रस्तुत किए।

  • 1866 में यह कार्य "पादप संकरण के प्रयोग" नामक शोधपत्र में प्रकाशित हुआ।

  • इन्हीं परिणामों के आधार पर वंशागति के नियमों का प्रतिपादन किया गया।

  • उस समय वैज्ञानिक इस कार्य का महत्व नहीं समझ पाए, इसलिए मेंडेल के नियम लंबे समय तक उपेक्षित रहे।

  • 6 जनवरी 1884 को मेंडेल की मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय वे दीर्घकालीन वृक्कशोथ (Chronic nephritis) से पीड़ित थे।


2.3 मेंडेलवाद की पुनर्खोज (Rediscovery of Mendelism)

  • मेंडेल के नियम लगभग 35 वर्षों तक उपेक्षित रहे।

  • सन् 1900 में स्वतंत्र रूप से तीन वैज्ञानिकों ने मेंडेल के नियमों की पुनः खोज की –

    1. ह्यूगो डी व्रीस (Hugo de Vries) – हॉलैंड

    2. कार्ल कोरेंस (Karl Correns) – जर्मनी

    3. एरिक वॉन शेरमाक (Erick Von Tschermak) – ऑस्ट्रिया

  • इन तीनों वैज्ञानिकों को मेंडेलवाद के पुनर्खोजकर्ता माना जाता है।


2.4 मेंडेल के प्रयोग (Mendel’s Experiments)

प्रयोग की मुख्य विशेषताएँ

  • प्रयोग की वस्तु – मटर का पौधा (Pisum sativum)

  • प्रयोग के प्रकार –

    • एकसंकर संकरण (Monohybrid hybridization)

    • द्विसंकर संकरण (Dihybrid hybridization)

लक्षणों का चयन

  • मेंडेल ने मटर में 34 विपरीत लक्षणों (Contrasting characters) का अध्ययन किया।

  • विस्तृत प्रयोग केवल 7 प्रमुख लक्षणों पर किए।

  • प्रत्येक लक्षण के दो स्पष्ट विपरीत रूप थे (जैसे – लंबा/बौना, गोल/झुर्रीदार बीज आदि)।


परीक्षा हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

  • प्रयोग काल – 1857 से 1865

  • शोधपत्र प्रस्तुति – 1865

  • प्रकाशन वर्ष – 1866

  • मृत्यु – 6 जनवरी 1884

  • मेंडेलवाद की पुनर्खोज – सन् 1900

  • पुनर्खोजकर्ता – Hugo de Vries, Karl Correns, Erick Von Tschermak



2.4.1 प्रयोग के लिये मटर पौधे की उपयुक्तता (Suitability of Pea Plant)

  • मटर एकवर्षीय पौधा है – एक वर्ष में कई पीढ़ियों का अध्ययन संभव।

  • फूल उभयलिंगी होते हैं – परपरागण व विपुंसन (Emasculation) आसानी से किया जा सकता है।

  • प्राकृतिक रूप से स्वपरागित – शुद्ध वंश (Pure line) प्राप्त करना सरल।

  • अनेक स्पष्ट विपरीत लक्षण उपलब्ध।


2.4.2 मेंडेल की अध्ययन विधि एवं सफलता के कारण

  • शुद्ध नस्ल (Pure breeding) पौधों का चयन।

  • एक समय में केवल एक लक्षण का अध्ययन।

  • सही सांख्यिकीय अभिलेख एवं गणितीय विश्लेषण।

  • F₃ पीढ़ी तक अध्ययन।


2.4.3 मटर के सात जोड़ी विपरीत लक्षण (Selection of Traits)

  1. पौधे की लंबाई – लंबा / बौना

  2. फूलों की स्थिति – कक्षीय (Axillary) / अग्रस्थ (Terminal)

  3. फली का रूप – चपटा / संकीर्ण

  4. कच्ची फली का रंग – हरा / पीला

  5. बीज की आकृति – गोल / झुर्रीदार

  6. बीजचोल का रंग – धूसर / श्वेत

  7. बीजपत्र का रंग – पीला / हरा


2.5 मेंडेल द्वारा किये गये प्रयोग

  • जनक पीढ़ी (P), प्रथम संतानीय पीढ़ी (F₁), द्वितीय संतानीय पीढ़ी (F₂)

  • मुख्य प्रयोग –

    • एकसंकर संकरण (Monohybrid cross)

    • द्विसंकर संकरण (Dihybrid cross)


2.5.1 एकसंकर संकरण (Monohybrid Cross)

  • एक जोड़ी विपरीत लक्षणों के बीच संकरण।

  • उदाहरण – लंबा (TT) × बौना (tt)

परिणाम

  • F₁ पीढ़ी – सभी पौधे लंबे (Tt) – प्रभावी लक्षण प्रकट।

  • F₂ पीढ़ी –

    • लक्षण अनुपात (Phenotype) = 3 लंबा : 1 बौना

    • जीन अनुपात (Genotype) = 1 TT : 2 Tt : 1 tt


2.5.2 द्विसंकर संकरण (Dihybrid Cross)

  • दो जोड़ी विपरीत लक्षणों का एक साथ अध्ययन।

  • उदाहरण – गोल-पीला (RRYY) × झुर्रीदार-हरा (rryy)

परिणाम

  • F₁ – सभी गोल-पीले (RrYy)

  • F₂ लक्षण अनुपात = 9 : 3 : 3 : 1

    • 9 गोल पीले

    • 3 गोल हरे

    • 3 झुर्रीदार पीले

    • 1 झुर्रीदार हरे


2.6 मेंडेल के आनुवंशिकता के नियम (Mendel’s Laws of Inheritance)

(1) प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)

  • विषमयुग्मजी अवस्था में केवल प्रभावी लक्षण प्रकट होता है।

(2) पृथक्करण का नियम / युग्मकों की शुद्धता (Law of Segregation)

  • युग्मक निर्माण के समय जीन युग्म अलग-अलग हो जाते हैं।

  • प्रत्येक युग्मक में एक ही कारक जाता है।

(3) स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)

  • भिन्न लक्षणों के जीन स्वतंत्र रूप से वंशागति करते हैं।

  • द्विसंकर संकरण पर लागू।


2.7 मेंडेल के नियमों का महत्व (Importance of Mendel’s Laws)

  • संकरण संतानों का पूर्वानुमान संभव।

  • उपयोगी लक्षणों का विकास व हानिकारक लक्षणों का निष्कासन।

  • उन्नत किस्मों का विकास – फसल व पशुपालन में उपयोग।

  • मानव आनुवंशिकी एवं सुजनिकी (Eugenics) का आधार।


अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision)

  • एकसंकर अनुपात – 3 : 1

  • जीन अनुपात – 1 : 2 : 1

  • द्विसंकर अनुपात – 9 : 3 : 3 : 1

  • F₁ में केवल प्रभावी लक्षण दिखाई देता है।

  • स्वतंत्र अपव्यूहन नियम द्विसंकर संकरण पर आधारित है।


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